महेंद्र सिंह एक ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता और जनसंघर्ष के प्रतीक के रूप में पहचाने जाते हैं, जिन्होंने दबी-कुचली, शोषित और हाशिए पर खड़ी आवाम की आवाज़ बनने का काम किया। उनका नाम किसी एक पद, सत्ता या चमक-दमक से नहीं, बल्कि संघर्ष, साहस और ज़मीनी आंदोलनों से जुड़ा हुआ है।
क्रांतिकारी राजनीति में साहसी नेताओं की जब भी बात होगी, निःसंदेह महेंद्र सिंह अग्रिम पंक्ति में नजर आएंगे। मौत का स्वागत जीवन के बसंत की तरह आत्मसात करने वाले क्रांतिकारी विसात के साहसी योद्धा महेंद्र सिंह ने सड़क से लेकर सदन तक, इतना ही नहीं जनता की हिफाजत के लिए जीवन के अंतिम क्षण तक इस साहस को अक्षुण्ण रखा।
झारखण्ड के गिरिडीह जिला नॉर्मल परिवार में जन्म लिया क्रन्तिकारी

महेंद्र सिंह का जन्म गिरिडीह जिले के बगोदर प्रखंड स्थित सुदूरवर्ती गांव खम्भरा , में 22 फरवरी 1954 में एक साधारण (नॉर्मल) परिवार में हुआ। सीमित संसाधनों और आम जनजीवन के बीच पले-बढ़े महेंद्र सिंह ने बचपन से ही अन्याय और शोषण को नज़दीक से देखा, जिसने आगे चलकर उन्हें एक क्रांतिकारी सोच और जनसंघर्ष के मार्ग पर ले जाने का काम किया।
उन्होंने गरीब, किसान, मजदूर और वंचित वर्ग के अधिकारों के लिए लगातार आवाज़ उठाई।
भाकपा(माले) से बगोदर का विधायक
महेंद्र सिंह भाकपा(माले) (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी–मार्क्सवादी लेनिनवादी) से बगोदर विधानसभा क्षेत्र के पूर्व विधायक थे। वे झारखंड में वामपंथी राजनीति और जनसंघर्ष के मजबूत स्तंभ माने जाते थे। महेंद्र सिंह को कुछ ही दिनों बाद उन्हें जननायक कहा जाने लगा, क्योंकि वे आम लोगों के मुद्दों को सीधे सड़कों, आंदोलनों और जनसभाओं तक ले गए।
क्रांतिकारी विरासत पर महेंद्र सिंह की भूमिका
क्रांतिकारी बिसात पर महेंद्र सिंह की भूमिका किसी रणनीतिक मोहरे से कम नहीं रही। वे केवल नारे लगाने वाले नेता नहीं थे, बल्कि मैदान में उतरकर लड़ने वाले जमीनी योद्धा रहे, जिन्होंने शोषण, अन्याय और सत्ता के दमन के खिलाफ जनता को संगठित किया। महेंद्र सिंह ने दबी-कुचली आवाम की समस्याओं को व्यक्तिगत पीड़ा तक सीमित नहीं रहने दिया। उन्होंने गरीब, किसान, मजदूर और युवाओं के सवालों को सामूहिक आंदोलन का रूप दिया। यही वजह है कि उनके नेतृत्व में छोटे-छोटे विरोध आगे चलकर बड़े जनसंघर्ष बने।

गरीब-गुरबों की लड़ाई में हमेशा आगे रहने वाले महेंद्र सिंह ने जनवादी अधिकार के आंदोलनों की गोलबंदी को ओर भी व्यापक बनाया। 1990 में आइपीएफ के बैनर तले और 95 व 2000 में भाकपा(माले) से बगोदर का विधायक रहे महेंद्र सिंह ने जनांदोलनों के नेतृत्व के कारण कई फर्जी मुकदमों में कारावास भी झेला था।
सामाजिक न्याय की लड़ाई में योगदान
महेंद्र सिंह का योगदान सामाजिक न्याय की लड़ाई में केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह जमीनी संघर्ष, संगठन और सतत प्रतिरोध के रूप में सामने आया। उन्होंने उन तबकों के लिए आवाज़ उठाई, जिन्हें व्यवस्था ने लंबे समय तक हाशिए पर रखा।
उन्होंने सामाजिक भेदभाव, शोषण और प्रशासनिक उदासीनता के खिलाफ निर्भीक प्रतिरोध किया। दबाव, धमकियों और दमन के बावजूद वे पीछे नहीं हटे—यही उनकी सबसे बड़ी ताकत रही। उनका योगदान तात्कालिक लाभ से आगे बढ़कर स्थायी सामाजिक बदलाव की ओर रहा। उन्होंने नेतृत्व तैयार किया, ताकि संघर्ष व्यक्ति-निर्भर न रहे और आंदोलन आगे भी चलता रहे।
महेंद्र सिंह की विचारधारा और प्रेरणा

महेंद्र सिंह की विचारधारा सत्ता-केंद्रित राजनीति से अलग, जनकेंद्रित और संघर्षशील सोच पर आधारित रही। उनका विश्वास था कि जब तक समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति को न्याय नहीं मिलता, तब तक विकास और लोकतंत्र अधूरे हैं।
उनका मानना था कि सामाजिक बदलाव केवल मांग-पत्रों से नहीं, बल्कि संगठित संघर्ष और जनदबाव से आता है। वे समझते थे कि बिना टकराव के व्यवस्था कभी अपने आप नहीं बदलती।
महेंद्र सिंह की हत्या कैसे और कहा हुआ था?
16 जनवरी 2005 को झारखंड की राजनीति और जनसंघर्ष को गहरा आघात लगा, जब बगोदर से भाकपा(माले) विधायक महेंद्र सिंह की निर्मम हत्या कर दी गई। कहा जाता है की जब वे अपने विधानसभा क्षेत्र के दुर्गी धवेया गांव में ग्राम सभा को सम्बोधित करने के बाद ग्रामीणों से बात कर रहे महेंद्र सिंह को कतिपय बंदूकधारियों ने मौत की नींद सुला दिया ,कहा जाता है की उस हत्याकांड में आईपीएस दीपक वर्मा और बीजेपी के कुछ नेता सम्मिलित थे | यह हत्या केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि दबी-कुचली आवाम की आवाज़ को दबाने की कोशिश थी। महेंद्र सिंह सामाजिक न्याय, भूमि अधिकार और शोषण के खिलाफ लगातार संघर्ष कर रहे थे, जिससे वे ताकतवर हितों की आंखों में खटकते थे। उनकी हत्या ने पूरे राज्य को झकझोर दिया और जनआंदोलनों में आक्रोश की लहर दौड़ गई। आज भी महेंद्र सिंह को एक निडर जननेता और क्रांतिकारी शहीद के रूप में याद किया जाता है।
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